गुलजार यांची एक अप्रतिम कविता. स्रहद्दीपलीकडचे लोक आणि आपण यांच्याविषयी एक गीतकार नव्हे तर एक हळुवार कवी किती कमी शब्दांत किती काय काय सांगून जातो हेच पहा:
सुबह सुबह इक थाप की दस्तक पर दरवाजा खोला, देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये है
आंखों से मानूस थे सारे, चेहरे सारे सुने सुनाये
पांव धोये, हाथ धुलाये, आंगन में आसन लगवाये
और तंदूर पे मकई के कुछ मोटे मोटे रोट पकाये
पोटली में मेहमान मेरे, पिछली सालोंकी फसलोंका गुड लाये थे
आंख खुली तो देखा घर में कोई नही था
हाथ लगाकर देखा तो तंदूर अभीतक बुझा नही था
और होटोंपर मीठे गुड का जायका अबतक चिपक रहा था
ख्वाब था शायद, ख्वाबही होगा
सरहद पर कल रात सुना है चली थी गोली
सरहद पर कल रात सुना है कुछ ख्वाबोंका खून हुवा है

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